aayu banee prastavana

इतना रूप सँवारूँगा तो कर कुछ और गुमान न लोगी!
इतनी बार पुकारूँगा तो तुम मुझको पहचान न लोगी!

मैं तो द्वार-पटों की थपकी आँधी वाली रातों में
हलकी सुरभित फूँक किसीकी, दृग के रज-आघातों में
भोर, अधखुली आँखों की, मैं प्राणों की मृदु स्वप्न-व्यथा
मैं यौवन का पहला चुंबन छत पर की बरसातों में

मुझको छवि-छाया छूकर ही तम में लय हो जाने दो
इतने चित्र उतारूँगा तो तुम मेरा मन जान न लोगी!

मैं कवरी का फूल तुम्हारा, टूट गया तो टूट गया
मैं मेंहदी का रंग तुम्हारा, छूट गया तो छूट गया
अब इतनी उलझन ही क्‍यों हो नव श्रृंगार सजाने में।
मैं दर्पण सुकुमार तुम्हारा, फूट गया तो फूट गया

यही बहुत है, साथ हुए थे हम-तुम पल भर जीवन में
इतनी देर निहारूँगा तो तुम कुछ मन में ठान न लोगी!

बत्ती बना, ऐँठ निज कर से, स्नेह तनिक-सा डालकर
छोड़ दिया जो दीपक तुमने जल के बहते थाल पर
अब उसको लौ की चिंता क्‍या, समा गयी जो शून्य में!
मैं आँसू की बूँद तुम्हारी, सूख गयी जो गाल पर

गीतों में अंकित कर अब वह निशि का स्वप्न सुहावना
इतने रंग निखारूँगा तो तुम उसको सच मान न लोगी!
इतना रूप सँवारूँगा तो कर कुछ और गुमान न लोगी!

1965