seepi rachit ret

कामरूप है देश जहाँ रहती हैं जादू की परियाँ,
बचपन में था सुना, बना पशु-पक्षी, जोड़ प्रणय-नाता,
मंत्र-शक्ति से बस में करके रख लेतीं वे सुंदरियाँ,
पथिक मनोहर, सरल-हृदय जो कोई वहाँ चला जाता।

राजकुमार उड़ा मैं भी जादू के घोड़े पर चढ़कर,
उड़ता हुआ एक दिन किसी अजान नगर में जा पहुँचा,
देखा मैंने वहाँ व्यस्त नारियाँ घूमती इधर-उधर,
पुरुष न एक, देखता पुर के मध्य भाग तक आ पहुँचा।

सबसे ऊँचा भवन खड़ा था वहाँ, राजगृह संभवत:,
देखा मैंने एक बालिका उसमें से बाहर निकली
घिरी दासियों से, लेकर कर में फूलों का हार, स्वतः
पहनाने के लिए सकुचती आयी मेरे पास चली।

मैं चिल्लाया ‘कामरूप’, मूर्छित खग-सा बिँध पाँखों में,
“अरे! बचाओ कोई मुझको जादू है इन आँखों में।!’

1941