shabdon se pare

मृत्यु की खोज में दीप यह प्राण का,
घोर तम की गुहा में बहा जा रहा
ज्योति किससे मिली, पंथ-निर्वाण क्या,
जानता भी नहीं कुछ, कहाँ जा रहा

चंद्र, तारे नहीं, पंथ देते दिखा
विद्युतों की न अंतःप्रकाशी शिखा
सूझता भी नहीं भाग्य में क्‍या लिखा

एक अंगार की लौ बनी चेतना,
मर्म की वेदना से दहा जा रहा

साँस में फाँस-सी एक आशा भरी
डगमगाती, नहीं डूब पाती तरी
देखते हैं गगन-भू, दिशायें डरी

शून्य में से सहस्रों विभायें रचा,
शून्य में वर्ण स्वर्णिम ढहा जा रहा

एक अज्ञात पीड़ा जलन हो रही
विरहिनी-सी विकल भावना रो रही
छू न पाती किसीको, स्वयं खो रही

एक चिर-लक्ष्य आगे बढ़ा जा रहा,
एक जीवन अधूरा रहा जा रहा

मृत्यु की खोज में दीप यह प्राण का,
घोर तम की गुहा में बहा जा रहा
ज्योति किससे मिली, पंथ-निर्वाण क्या,
जानता भी नहीं कुछ, कहाँ जा रहा

1954