aayu banee prastavana

तुम्हागी मदभरी चितवन मुझे जीने नहीं देगी
तुम्हारी अधखुली मुस्कान मेरे प्राण ले लेगी
शरद की आँच-सा शीतल
लहर के नाच-सा झलमल
गुलाबी पारदर्शी रूप
उस पर काँच-सा आँचल
नयन की दृष्टि बनती आवरण जिसकी अमलता को
बँधा लावण्य में जो रहा मार कुलाँच-सा प्रतिपल
उसीकी माधुरी अम्लान मेरे प्राण ले लेगी
छलकती रूप की प्याली
कटारी सी भवें काली
मली जैसे अदेखे स्पर्श ने
प्रत्यंग में लाली
हँसी , सिहररी , झुकी , लौटी, मुड़ी, फिर लौटकर आयी
धँसी जो प्राण में अनजान-सी वह दृष्टि मतवाली
उसीकी भूलती पहिंचान मेरे प्राण ले लेगी
सुरा भरपूर रखती हो
नशे में चूर रखती हो
तृषातुर प्राण को मधु-पात्र दिखला
दूर रखती हो
खिँचा मृग-मीन-सा मैं प्रेम-वंसी में तड़पता हूँ
सुकोमल गात कितना भी, हृदय तो क्रूर रखती हो
तुम्हारी क्रूरता यह, प्राण! मेरे प्राण ले लेगी
तुम्हारी मदभरी चितवन मुझे जीने नहीं देगी
तुम्हारी अधखुली मुस्कान मेरे प्राण ले लेगी

1954