ahalya

पल में कानन वह सजा मधुर नंदनवन-सा
सुरसदन केतकी-कुंज, मधुप नूपुर-स्वन-सा
यौवन-रस छलक पड़ा नयनों से गोपन-सा
सम्मुख बरजोरी खड़ा अतनु छायातन-सा
मन को लूटे लेता था

जाने, कैसी वह धुन थी जिसको सुन तत्क्षण
चेतना शिथिल बन गयी, छिन गया अपनापन!
सर्वस्व समर्पण करके भी आत्मा निर्धन-
संपूर्ण समझती थी निज को कसकर बंधन
ज्यों मुक्त किये देता था’