ahalya

खिँच गयीं वृद्ध नृप के ललाट पर रेखायें
सरसी में झिलमिल ज्यों द्वाभा-शशि-लेखायें
थे खड़े राम-लक्ष्मण सम्मुख दायें-बायें
बढ़ गये हाथ अनजाने तट ज्यों मिल जाये
डूबते हुए को जल में

‘रघुकुल-कुलदेव दिनेश अभी क्या हुए अस्त!
कौशल की रण-वाहिनी खड़ी तत्पर समस्त
मुनिवर! मैं स्वयं धर्म-रक्षण को खड्ग-हस्त
धिक्‌ जीवन! देखूँ साधु जनों को ध्वस्त, त्रस्त
जलते अन्याय-अनल में’