ahalya

श्यामल अलकें ज्यों बिछी शिला सम्मुख प्रभु के
राजीव-नयन गुरु की दिशि मुड़, संकुचित रुके
बोले मुनि, ‘राघव! रघुकुल का गौरव न झुके
परित्यक्ता गौतम-वधू पाप से शतक्रतु के
यह अबला, दीन, बिचारी

आहत हरिणी-सी उर में विष की लिए चोट
बस तनिक तुम्हारी चरण-रेणु-हित रही लोट
प्रभु दो कलंकिनी को करुणा की अभय ओट
ढह जायें जिससे कोटि जन्म के पाप-कोट
फूले उदास फुलवारी’