geet vrindavan

कौन बाबा की व्यथा बताये!
आँसू बहे न सिसकी निकले छाती रूँधती  जाये

‘पथ पर सदा टकटकी बाँधे
अब वे रहे सूख कर आधे
तेल बिना दीपक दम साधे

ज्यों बुझने पर आये

‘हरि कब लौटेंगे?” घर-घर में
लोग पूछते आकुल स्वर में
बोल न कुछ पाते उत्तर में
रहते शीश झुका ये


प्रभु दुखभरे ये वचन सुनकर
वीतराग न रह सके पल भर
गहन व्यथा से तड़पा अंतर

नयन अश्रू भर लाये

कौन बाबा की व्यथा बताये!
आँसू बहे न सिसकी निकले छाती रूँधती  जाये