geet vrindavan

इसी कदम्ब तले

कभी राधिका और श्याम दिखते थे गले-गले

 

यमुना वही, वही मधुवन है

वही चाँद है, वही गगन है

किन्तु गूँजता झिल्ली स्वप्न है

वंशी के बदले

 

रास नहीं रचते अब तट पर

धूम न मचती है पनघट पर

जुड़ते नहीं द्वार के वट पर पंछी साँझ ढले

 

यों तो फिर भी मेघ घिरेंगे

नयनों में घनश्याम तिरेंगे

किन्तु भूल कर भी न फिरेंगे

अब वे दिन पहले

 

इसी कदम्ब तले

कभी राधिका और श्याम दिखते थे गले-गले