nao sindhu mein chhodi

रात सुन ली थी तान तुम्हारी

अश्रु-सजल देखी थीं वे  दो आँखें प्यारी-प्यारी

 

पीछे उड़ता हुआ समय में

पहुँच गया मैं उस नव वय में

जब तुमने पहले परिचय में

सुध-बुध हर ली सारी

 

कितनी भी हो प्रीति परायी

मन की लौ बुझती न बुझायी

फिर से प्राणों में लहरायी

केसर की- सी क्यारी

 

क्या वह मेरा चिर-संयम था

या कि आत्म-गरिमा का भ्रम था

सम्मुख जो घिर आया तम था

रोके राह हमारी

 

रात सुन ली थी तान तुम्हारी

अश्रु-सजल देखी थीं वे  दो आँखें प्यारी-प्यारी