ravindranath:Hindi ke darpan me

अशेष

आबार आह्वान
यत किछू छिलो काज
सांग तो करेछी आज
दीर्घ दिनमान ।

जागाये माधवीवन
चले गेछे बहु क्षण
प्रत्यूष नवीन,
प्रखर पिपाशा हानि
पूष्पेर शिशिर टानि
गेछे मध्यदिन,
माठेर पश्चिम शेषे
अपराह्न म्लान हेसे
होलो अवसान
परपारे उत्तरिते
पा दियेछी तरनीते
तबूउ आह्वान ?

अशेष

कार्य जो दिए थे कभी,
पूरा कर चुका मैं सभी.
दिन भर खट भूत के समान
मुक्ति को विकल हैं प्राण,
डूब रहा अंशुमान,
अब भी यह तुम्हारा आह्वान !

सुप्त मधुबन को जगा,
उषा हो चुकी है विदा.
ज्योतिमय बनाती दिशाकाश
फूलों का चुरा पराग,
मध्य दिन भी गया भाग,
ओस के कणों से बुझा प्यास

हाट के पश्चिम कुवेश,
शेष दिन हो गया शेष,
मैंने निज विरामसमय जान,
छोड़ पार तक आ नाव,
तट पर धरे ही हैं पाँव,
अब भी तुम्हारा यह आह्वान !

 

नामे संध्या तन्द्रालसा
सोनार आँचलखसा
हाथे दीपशिखा
दिनेर कल्लोल ‘पर
टानि दिलो झिल्लिस्वर
घन यवनिका ।
उ पारेर कालो कूले
कालि घनाइया तूले
निशार कालिमा,
गाढ़ से तिमिर-तले
चक्षू कोथा डूबे चले
नाहि पाय सीमा ।
नयनपल्लव ‘परे
स्वप्न जड़ाइया धरे
थेमे जाय गान,
क्लांति टाने अंग मम
प्रियार मिनति सम
एखनो आह्वान ?

संध्या तन्द्रा से भरी,
स्वर्ण वसन में उतरी,
कर में रवि का लिए प्रदीप
कोलाहल गया ठहर,
गूँज रहा झिल्ली-स्वर,
मौन हुए घरों के समीप

तम ने नभ लिया घेर,
दृष्टि जिधर भी लूँ फेर,
कुछ भी दिखता न आर-पार
निशि का फैला दुकूल,
ढँकता सरिता के कूल,
छाया दिशाओं में अंधकार

पूरे कर दिन के काम,
आपस में हाथ थाम,
फिरते कृषक गाते हुए गान
निद्राकुल, क्लांत, अलस,
सुनता प्रिया-विनय सदृश,
अब भी मैं तुम्हारा आह्वान !

 

रे मोहिनी, रे निष्ठुरा,
उरे रक्त-लोभातुरा
कठोर स्वामिनी
दिन मोर दीनू तोरे
शेष नीते चास ह’रे
आमार यामिनी ?
जगते सबारइ आछे
संसार सीमार काछे
कोनोखाने शेष
केनो आसे मर्मच्छेदि
सकल समाप्ति भेदि
तोमार आदेश ।
विश्वजोड़ा अंधकार
सकलेरइ आपनार
ऐकलार स्थान
कोथा होते तारा माझे
विद्यूतेर मतो बाजे
तोमार आह्वान ।।

ओ मेरी स्वामिनी निठुर,
ओ री ! रक्त-लोभातुर,
निशि में दो सभी को विराम
कर्म दो मुझे ही घोर,
जिस पर चले न जोर,
सेवा में रहूँ मैं आठों याम
दिए बिना पल विराम,
निशि में भी मुझी से काम,
नहीं जिससे मुक्ति का उपाय
दिनभर रख सेवा-लीन,
मेरी रात भी लो छीन,
यही है तुम्हारा, देवि ! न्याय !
जग में कोटि-कोटि दास,
खड़े चरणों के पास,
पाते हैं तुम्हारी कृपा-कोर
कर मुझी पर दृष्टि वाम,
दिया है क्यों ऐसा काम,
जिसका नहीं कोई ओर-छोर !
करते सुख-शान्ति भोग,
मुक्त निज घरों में लोग,
होता ज्यों ही दिन का अवसान
आता भरे जग के पार,
मुझ ही अकेले के द्वार
तड़ित् सा अब भी यह आह्वान !

 

दक्षिण समुद्रपारे
तोमार प्रासादद्वारे
हे जाग्रत रानी,
बाजे ना कि संध्याकाले
शांतसुरे क्लांतताले
बैराग्येर वानी ?
सेथाय कि मूक वने
घूमाय ना पाखीगने
आँधार शाखाय ?
तारागुलि हर्म्य-शीरे
उठे ना कि धीरे धीरे
नि:शब्द पाखाय?
लताबितानेर तले
बिछाय ना पूष्पदले
निभृत शयान ?
हे अश्रांत शांतिहीन
शेष होए गेलो दिन
एखनो आह्वान ?

दक्षिण सागर के पार,
तुम्हारे भवन के द्वार,
हे महा-महिमामयी रानी!
संध्या-वेला में क्लांत,
गूँजती नहीं है शांत,
क्या कभी विरागमयी वाणी!

दिन-भर के थके फूल,
तरु पल्लवों में झूल,
सोते नहीं होती जब रात !
वहाँ भवनों के पास,
उठती न क्या सहास,
सेवा-मुक्त तारकों की पाँत!

पंछी डालियों से लगे,
निशि में भी रहते जगे,
छेड़ते निरंतर नयी तान !
हे कठोर ! हे निर्दयी !
दिन की अवधि बीत गयी,
अब भी यह तुम्हारा आह्वान !

 

रहिलो रहिलो तबे
आमार आपन सबे
आमार निराला,
मोर संध्यादीपालोक
पथ चाउया दूटि चोख,
यत्नेगाँथा माला ।
खेयातरी याक बये
गृह-फेरा लोक लये
उ पारेर ग्रामे ,
तृतियार क्षीण शशि
धीरे पड़े याक खशि
कुटिरेर वामे ।
रात्रि मोर, शांति मोर,
रहिलो स्वप्नेर घोर,
सुस्निग्ध निर्वाण
आबार चलिनू फिरे
बहि क्लांत नतशिरे
तोमार आह्वान ।।

नष्ट हो चुके हैं अब,
मुझे तो प्रिय थे जो सब,
मेरा घर, एकांत, मेरी शान्ति,
मेरा यत्न-ग्रथित हार,
मेरे नयन भरे प्यार,
मेरे सांध्य-दीपकों की कान्ति

चंद्र तृतीया का क्षीण,
थकित-वदन, ज्योति-हीन,
ढल रहा कुटीर की ले आड़
श्रमिक मुक्त चढ़े नाव,
लौट रहे अपने गाँव,
हाट-बाट हो रहे उजाड़

मेरी शान्तिभरी रात,
अब है स्वप्न की-सी बात,
नत-मुख छाया-मूर्ति के समान,
हारा-थका, सब कुछ गवाँ,
मैं तो फिर लौट रहा,
सिर पर लिए तुम्हारा आह्वान !

 

बोलो तबे कि बाजाबो
फूल दिये कि साजाबो,
तब द्वारे आज
रक्त दिये कि लिखिबो,
प्रान दिये कि शिखिबो,
कि करिबो काज ?
यदि आँखि पड़े ढुले
श्लथ हस्त यदि भूले
पूर्व निपुनता
वक्षे नाहि पाई बल
चक्षे यदि आसे जल
बेधे जाय कथा
चेयो नाको घृणाभरे
कोरो नाको अनादरे
मोरे अपमान
मने रेखो हे निदये
मेनेछिनु असमये
तोमार आह्वान ।।

बोलो तब मैं क्या बजाऊँ !
फूलों से कैसे सजाऊँ !
देवि ! अब तुम्हारा सिंह-द्वार
रक्त से लिखूँ क्या गीत,
प्राण दे करूँ क्या प्रीत !
सेवा भी करूँ मैं किस प्रकार !

आँखों में पड़ी हो धूल,
कम्पित कर करें जो भूल,
पहले सी निपुणता हो न शेष
बाहों में रहे न बल,
आँखों से बहे जो जल,
पूर्व शक्ति का मिले न लेश

घृणा-रोष से भर कर,
कर देना न अनादर,
मेरी रचना को तुच्छ मान
रखना ध्यान में यह सदा,
असमय था मान लिया,
देवि ! मैंने तुम्हारा आह्वान !

 

सेवक आमार मतो
रयेछे सहस्र-शत
तोमार दुयारे
ताहार पेयेछे छुटि,
घूमाय सकले जुटि
पथेर दू धारे ।
शुधू आमि तोरे सेवि
बिदाय पाइ ने देवि,
डाको क्षने-क्षने ।
बेछे नीले आमारेइ
दुरूह सौभाग्य सेइ
बहि प्राणपने ।
सेई गर्वे जागी रबो
सारा रात्रि द्वारे तव
अनिद्रनयान
सेई गर्वे कंठे मम
बहि बर-माल्य-सम
तोमार आह्वान ।।

सेवक मुझ-से अपार,
रहते जो तुम्हारे द्वार
गिना भी न जाए जिनका नाम
निशि में हो कार्य मुक्त,
होते न फिर से नियुक्त,
सोते सभी घर जा पूर्णकाम
जाने क्या मुझी में देख,
उनमें से मुझे ही एक
फिर-फिर तुम रही हो पुकार
क्यों न पा यह भाग्य बड़ा,
द्वार पर रहूँ मैं खड़ा,
श्रम से न मानूँ कभी हार?
सब में से मुझे चुन कर,
सेवा का दिया अवसर,
भूलूँ कैसे यह कृपा विशेष,
इसी गर्व से जागृत,
कर्मरत रहूँगा सतत,
निशि में भी न होगा मुझे क्लेश
मुझे निजी दास बना,
दिया जो यह स्नेह घना,
अपना सौभाग्य इसे मान
वर-माला सदृश क्षण-क्षण,
ढोऊँगा अनिद्र-नयन
देवि तुम्हारा यह आह्वान !

 

होबे, होबे, होबे जय-
हे देवी, करि ने भय,
होबे आमि जयी ।
तोमार आह्वान-वानी
सफल करिबो रानी,
हे महिमामयी ।
काँपिबे ना क्लांत कर,
भाँगिबे ना कंठ-स्वर
टूटिबे ना बीना
नवीन प्रभात लागि
दीर्घ रात्रि रबो जागि,
दीप निबिबे ना ।
कर्मभार नव प्राते
नव सेवकेर हाते
करि जाबो दान
मोर शेष कंठस्वरे
जाइबो घोषणा करे
तोमार आह्वान ।।

होगी जय, होगी जय,
हे देवी ! करो न भय,
निश्चय ही होगी मेरी जीत
तुम्हारी आह्वान-वाणी,
सफल करूँगा रानी !
रच-कर नित नए-नए गीत

काँपेंगे न क्लांत कर,
टूटेगा न कंठ-स्वर,
वीणा-ध्वनि होगी नहीं मंद
होने तक नव-प्रभात,
जाग बिता दूँगा रात,
बाँधता सुरों में नए छंद

नए भृत्य को पाकर,
प्रात: नयी लय से भर,
सौंप दूँगा जय का यह निशान
मेरा शेष कंठ-स्वर,
जायेगा घोषणा कर,
देवी ! यह तुम्हारा आह्वान !