sab kuchh krishnarpanam

अयि मानस-कमल-विहारिणी!

हंस-वाहिनी! माँ सरस्वती! वीणा-पुस्तक-धारिणी!

शून्य अजान सिन्धु के तट पर

मानव-शिशु रोता  था कातर

उतरी ज्योति सत्य, शिव, सुन्दर

तू भय-शोक-निवारिणी

 

देख प्रभामय तेरी मुख-छवि

नाच उठे भू, गगन, चन्द्र, रवि

चिति की चिति तू  कवियों की कवि

अमित रूप विस्तारिणी

 

तेरे मधुर स्वरों से मोहित

काल अशेष शेष-सा नर्तित

आदि-शक्ति तू अणु-अणु में स्थित

जन-जन-मंगलकारिणी

अयि मानस-कमल-विहारिणी!

हंस-वाहिनी! माँ सरस्वती! वीणा-पुस्तक-धारिणी!

 

Feb 85