shabdon se pare

डूब रहा हूँ मैं महाशून्य के आँधेरे में

साँस घुटी जाती है, काया अकुलाती है
रह-रहकर घंटी-सी, कानों में आती है
प्राण छटपटाते हैं, थाह नहीं पाते हैं
थकित-चरण, शिथिल-गात, कंठ रुँधे जाते हैं

अंग-अंग चूर्ण हुए घूर्णित इस घेरे में

डूब रही भग्न नाव, डूब रहे घर-गाँव
डूब रहे बंधु-सुहद, शून्य हुए हाथ-पाँव,
तिमिर भूमि, तिमिर व्योम, तिमिर भानु, तिमिर सोम
चारों ओर तम अथाह, तिमिर-लीन रोम-रोम

फिरता मन भटका-सा फिर-फिर इस फेरे में

कौन जो उबार सके, प्यार से दुलार सके!
भग्न-पोत-पथिक प्राण, तीर पर उतार सके!
शून्य की गुफाओं से, तिमिर की घटाओं से
चेतन को खींच सके सलिल की भुजाओं से!

ले चला गजेंद्र को जलेंद्र निज बसेरे में
डूब रहा हूँ मैं महाशून्य के अँधेरे में

1968