usha

यह कैसा कोमल करुण राग
सुन जिसे स्वप्न से मैं जैसे रह-रह उठता हूँ जाग-जाग

मन को मिलता विश्राम नहीं
छाया दिक्-दिक् से घेर रही
थे चरण कहीं कल, आज कहीं
मलयज में उड़ता ज्यों पराग

यह कौन कुहुकिनी मानस में
भर रही विकलता नस-नस में
मैं आप नहीं अपने वश में
चिर-शून्य दिशा में रहा भाग

यह स्वर्ण-किरण धर लूँ कैसे!
निज में अग-जग भर लूँ कैसे
परिचय किस से कर लूँ कैसे!
मुझको अपने से ही विराग

यह कैसा कोमल करुण राग
सुन जिसे स्वप्न से मैं जैसे रह-रह उठता हूँ जाग-जाग