परिचय

महाकवि गुलाब खंडेलवाल

(फरवरी २१, १९२४ — जुलाई २, २०१७)

श्री गुलाब खंडेलवाल का जन्म भारत में राजस्थान के शेखावाटी प्रदेश के नगलगढ़ नगर में २१ फरवरी १९२४ को हुआ था। गुलाबजी की प्रारंभिक शिक्षा बिहार के गया नगर में हुई तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से उन्होंने १९४३ में बी.ए. किया। काशी के छात्र-जीवन में उनका सम्पर्क सर्वश्री बेढब बनारसी, हरिऔधजी, मैथिलीशरणजी, निरालाजी, बाबू सम्पूर्णानन्द, बाबू श्यामसुन्दर दास, पं. नन्ददुलारे बाजपेयी, पं. कमलापति त्रिपाठी, पं. सीताराम चतुर्वेदी, पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी आदि से हुआ जिससे उनके साहित्यिक संस्कार पल्लवित हुए। १९४१ में सत्रह वर्ष की उम्र में उनका पहला गीत और कविताओं का संग्रह ‘कविता’ नाम से महाकवि निराला की भूमिका के साथ प्रकाशित हुआ। तब से अब तक उनके पचास से ऊपर काव्यग्रंथ, दो गद्य-नाटक और एक आत्मकथा प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें से कुछ ‘डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ़ इंडिया’ में digitalized भी किए गये हैं।

गुलाबजी ने हिन्दी में महाकाव्य, खंडकाव्य, मसनवी, गीत, सॉनेट, रुबाई (चतुष्पदियाँ), दोहा, सम्बोधि-गीत (odes), गड़ेरिये के गीत, प्रतीक काव्य (Elegies), गाथा-काव्य (Lyrical Ballads), गीति-नाट्य (poetic drama), ग़ज़ल, मुक्त-छंद (नयी शैली की कविता) और मुक्तक आदि के सफल प्रयोग किये। इनमें से कई विधाओं का तो सूत्रपात ही उन्होंने किया और कई को पुनर्जीवित किया। इन सभी विधाओं पर उनकी लेखनी निर्बाध रूप से समान गति से चली। भाषा पर उनका पूरा अधिकार था। उनका कवित्व सामर्थ्य एक ओर संस्कृत तो दूसरी ओर उर्दू के क्षितिज को छूता है। २०१३ में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘रवीन्द्रनाथ : हिन्दी के दर्पण में’ हिन्दी साहित्य में मील का पत्थर है। इसमें उन्होंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बंगला में लिखी कुछ कविताओं का हिन्दी में भावानुवाद किया।

गुलाबजी ने हिन्दी में ग़ज़लों की रचना करके हिन्दी में उर्दू के स्वीकृत शब्दों के योग से ग़ज़लों के अनुरूप भाषा का सफलतापूर्वक प्रयोग किया। इन्होंने लगभग पौने चार सौ ग़ज़लें लिखी।

उर्दू मसनवी की शैली में गुलाबजी की रचना ‘प्रीत न करियो कोय’ हिन्दी के काव्य-साहित्य में एक नया आयाम जोड़ती है। इस मसनवी से वे उर्दू के प्रमुख मसनवी-लेखक मीर हसन और दयाशंकर ‘नसीम’ की श्रेणी में उसी प्रकार आ गये जिस प्रकार अपने भक्ति-गीतों की सुदीर्घ श्रृंखला द्वारा कबीर, सूर, और तुलसी की परंपरा में उन्होंने अपना स्थान सुरक्षित करा लिया।

गुलाबजी ने हिन्दी और उर्दू के अलावा अंग्रेज़ी में भी कवितायेँ लिखी जिससे भारत देश के बाहर विदेश में भी लोगों ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। ‘The Selected Poems’ में उन्होंने अपनी कुछ हिंदी कविताओं का अंग्रेज़ी में भावानुवाद किया और कश्मीर के पूर्व राजकुमार डॉ. कर्ण सिंह की भूमिका के साथ प्रकाशित किया। उनकी मौलिक अंग्रेजी कविताओं की पुस्तक ‘The Evening Rose’ ने उन्हें अंग्रेजी कवियों के बीच स्थापित किया। उनकी अंग्रेजी की नवीनतम पुस्तक ‘Omar Khayyam and the Scholar’ प्रकाशनाधीन है। इस प्रकार, हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी की तीनों ही भाषायों में प्रतिष्ठा पानेवाले वे हिन्दी के प्रथम कवि हुए हैं।

गुलाबजी ने एक हजार से ऊपर गेय गीतों की रचना द्वारा साहित्य से संगीत को जोड़ने का दुर्वह कार्य करके हिन्दी साहित्य की बहुत बड़ी सेवा की। यही नहीं, उनके गेय गीतों में पाँच सौ से ऊपर भक्ति-गीत हैं। इन गीतों ने सैकड़ों वर्षों से अवरुद्ध भक्ति-काव्य-धारा को आधुनिक काल के अनुरूप काव्य की वाणी देकर पुन: जीवित कर दिया है। इसके अतिरिक्त, गुलाबजी ने ‘गीत-वृन्दावन’, ‘सीता-वनवास’ तथा ‘गीत-रत्नावली’ जैसे गीति-काव्यों की रचना करके राधा, सीता, और रत्नावली के जीवन की त्रासदी को भी नये रूप में प्रस्तुत किया। ‘गीत-वृन्दावन’ और ‘सीता-वनवास’ के अनेक गीतों को विभिन्न गायकों द्वारा गाया गया है और मंच पर इनकी नृत्य द्वारा प्रस्तुति भी हुई है।

गुलाबजी की छः पुस्तकें – ‘उषा’, ‘रूप की धूप’, ‘सौ गुलाब खिले’, ‘कुछ और गुलाब’, ‘अहल्या’, एवं ‘हर सुबह एक ताज़ा गुलाब’ – उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा तथा ‘आधुनिक कवि, १९’ बिहार सरकार द्वारा पुरस्कृत हो हुई। १९८५ में खंडकाव्य ‘अहल्या’ हनुमान मन्दिर ट्रस्ट, कलकत्ता, द्वारा भी पुरस्कृत हुई। उनकी चार पुस्तकें, ‘उषा’, ‘अहल्या’, ‘कच-देवयानी’ तथा ‘आलोक-वृत्त’, समय-समय पर बिहार और उत्तर प्रदेश के विभिन्न कॉलेजों के पाठ्यक्रम में स्वीकृत रही हैं। उनका खंडकाव्य ‘आलोक-वृत्त’ १९७६ से उत्तर प्रदेश में इंटर के पाठ्‌यक्रम में स्वीकृत है।

गुलाबजी को १३ जुलाई १९८५ को काव्यसंबंधी उपलब्धियों के लिए अमेरिका के बाल्टीमोर नगर की मानद नागरिकता प्रदान की गयी। इस अवसर पर मेरीलैंड के गवर्नर ने समस्त मेरीलैंड स्टेट में १३ जुलाई को हिन्दी-दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। ६ दिसम्बर १९८६ को अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति, अमेरिका, द्वारा राजधानी वाशिंग्टन डी. सी. में विशिष्ट कवि के रूप में उन्हें सम्मानित किया गया। १९८९ में गुलाबजी को हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, द्वारा पद्मभूषण डा. रामकुमार वर्मा की अध्यक्षता में ‘साहित्य वाचस्पति’ की सर्वोच्च उपाधि से सम्मानित किया गया।

१९९७ में ‘भक्ति गंगा’ और ‘तिलक करे रघुवीर’ का उद्घाटन माननीय राष्ट्रपति श्री शंकरदयाल शर्मा के द्वारा हुआ। १० अक्टूबर १९९८ को गुलाबजी को अल्बर्टा हिंदी परिषद, एडमंटन (कनाडा), ने सम्मानित किया। २००१ में उत्तर प्रदेश के इटावा शहर में गुलाबजी को श्री मुरारी बापू, श्री विष्णुकांत शास्त्री, श्री शांतिभूषण तथा मुलायम सिंह यादव ने मिलकर सम्मानित किया, जिसपर मुरारी बापू ने कहा, “आज धर्म, शासन, राजनीति और कानून ने एकसाथ आपको सम्मानित किया है”।

२००६ में अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डी. सी. में अमेरीका और भारत के सम्मिलित तत्वाधान में आयोजित गणतंत्र-दिवस समारोह में मेरीलैंड के गवर्नर द्वारा गुलाबजी को ‘कवि-सम्राट’ की उपाधि से अलंकृत किया गया। २८ अप्रैल २०१३ में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, ऑहियो (अमेरिका), ने हिंदी साहित्य में अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें ‘आज के तुलसीदास’ खिताब से सम्मानित किया। २२ अप्रैल २०१७ में ऑहियो (अमेरिका) की वज़्मे-सुखन संस्था ने गुलाबजी के साहित्यिक योगदान पर उन्हें ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित किया।

गुलाबजी बीस वर्षों से भी अधिक काल तक हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, के सभापति रहे। इस पद पर वे सर्वसम्मति से छः बार चुने गये। २००७ में पं. मालवीयजी द्वारा स्थापित सुप्रसिद्ध साहित्यिक संस्था भारती परिषद, प्रयाग, के वे अध्यक्ष चुने गये। अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति की ओर से अमेरिका में प्रकाशित त्रयमासिक पत्रिका ’विश्वा’ के सम्पादक-मंडल के वे १५ वर्षों तक वरिष्ठ सदस्य रह चुके थे। गुलाबजी ‘अर्चना’ (कोलकाता) के अध्यक्ष भी रह चुके थे। गुलाबजी के सभापतित्व में श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने वाशिंगटन डी. सी. (अमेरिका) में कविता पाठ किया था।

गुलाबजी के साहित्य के विविध अंगों पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में पी. एच. डी. के सात शोधनिबंध लिखे जा चुके हैं तथा तीन और शोधपत्रों पर कार्य हो रहा है।

गुलाबजी हिन्दी के विशिष्ट कवि थे तथा विदेश में रहकर हिन्दी की सेवा निरंतर कर रहे थे। उन्होंने उच्च कोटि के साहित्य-सृजन के साथ-साथ विदेश में रहकर हिन्दी के प्रचार प्रसार में विशेष योगदान दिया। छायावाद-चतुष्टय – प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी – के बाद हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवियों में उनकी गणना होती है।