ahalya

जो पीड़ित, लांछित, दीन, दुखी दुर्बल, अनाथ
चिर-पतित, अपावन, जग में चलते झुका माथ
मैं भक्ति-मुक्ति से भरता उनके रिक्त हाथ
दूँ बहा सृष्टि में प्रेम-जाह्नवी पुण्य-पाथ
बस इसी लिए आया हूँ

अब रहा न तेरी पावनता में मीन-मेष
बीती दुख की तम-निशा, सुखों का प्रात देख
मुनि-रोषानल में तप कर निर्मल कनक-रेख,
पढ़ आज, अहल्ये! नूतन जीवन-भाग्य-लेख
जो तेरे हित लाया हूँ’