ahalya

पर काँप उठी वाणी मुनि की चलदल-दल-सी
यह प्रीति अनियमित देख शुकी से सेमल की
तप-गुरुता की होगी न हँसी मिथ्या छल-सी
कहलायेगी नारी न चपल ढलमल जल-सी
दिक्‌-दिक्‌ ज्ञानी-कवियों से

अंतर की चेतन शिखा लिये नीरस, फीकी
पूरी कर पाऊँगा मैं साधें तरुणी की
तुम, देवि ! रूप की मणि, सुषमा-खनि अवनी की
ले रही होड़ छवि-छाया जिसके मुख-श्री की
सुर-भवनों की छवियों से’