ahalya

बोले कौशिक ‘यह नहीं शोक का है अवसर
लौटेंगे द्रुततर कुँवर मुक्ति-फल दे घर-घर
प्रिय नहीं तुम्हें ही, मुझे प्राण से भी बढ़कर
कर नहीं सकेंगे बाल तनिक बाँका निशिचर–
इनका, छोड़ो भय सारे

माना चौथेपन में पाये कर यत्न घोर
जीवन-फल से ये श्याम-गौर चारों किशोर
नृप ! कितु प्रेय से श्रेय सदा होता कठोर
हैं लगे इन्हीं पर जग के आशा-नयन-कोर
सुत केवल नहीं तुम्हारे’