seepi rachit ret

विरहिणी

देख रहा मैं दूर चाँदनी के देशों के पार कहीं,
शून्य कक्ष में, मूँद गुलाबी पलकें, बाला एक थकित
दिव-श्रम से, सोयी, कपोल में बिबित जिसके पड़ा बहीं
उतरा हुआ सितार, अधखुली अधर-कली है मंदस्मित।

गंधभरी उन्मद साँसें चल रहीं मूक रेखाओं-सी,
क्षण-क्षण उठते-गिरते हिम-से श्वेत वक्ष पर बायाँ हाथ
तिरछा झुका पड़ा, पाँचों उँगलियाँ फेन-लेखाओं-सी
चल अंचल में लिपटी उठ-गिर रहीं हृदय-स्पंदन के साथ!

जलता कोने में दीपक जिसके चरणों में नाच रहा
अंधकार, जैसे उस बाला की अलकें झिलमिल हिलतीं
शुभ्र भाल पर। मौन कक्ष, कोई तार्किक हों जाँच रहा
मानो किसी नियम को उसमें देख जटिल शंका मिलती।

आती हुई पवन से कहती दीपशिखा झुक, ‘मत छूना
इस सुषुप्त छवि को;’ शय्या का आधा भाग पड़ा सूना।

1941