usar ka phool

तीन चित्र

शशि का यह कलंक, आकृतियाँ बदल रहा क्षण-क्षण मनमानी
इन तीनों चित्रों में अच्छा तुम्हें कौन-सा लगता, रानी!

बढ़ फेनोज्वल सिंधु-तरंगें नील शिला से लेती टक्कर
कर में वीणा लिए गा रही बैठी एक बालिका जिस पर
उसका शीशफूल हिलता जलकण में जो उड़ते लहरों से
कर में वीणा लिए गा रही नीरव स्वर में वह पहरों से
रश्मि-तार पर चित्रित उसकी स्वर्णाभामय मृदुल उँगलियाँ
श्यामल वेणी में गुंफित हैं दीप-शिखा-सी पाटल-कलियाँ
मलयानिल आकर दिगंत से अंचल छोर उड़ाता प्रतिपल
सरस्वती-सी रजत-मराल ऊर्मियों पर बैठी वह निश्चल

सित करि-शावक चढ़ा रहे घन उस पर स्वर्गंगा का पानी

वाम चरण दक्षिण पर टेके, श्याम तमाल-कुंज के नीचे
करतल पर मुख-शशि रख सोये हैं घनश्याम कमल-दृग मींचे
मुकुट मोर की पाँखोंवाला तिरछा झुका पड़ा आँखों पर
गलित कनक-सा वाम पार्श्व में श्याम-बिंबमय बहता निर्झर
मृग के धोखे में मोहन पर तीर न छोड़े कोई व्याधा
निर्झर नहीं, सजग प्रतिक्षण वह पगतल में लेटी हैं राधा
सोने जैसी राधा-रानी मोहन का रंग श्याम, सलोना
दोनों के मुख की आभा से दीपित नभ का कोना-कोना

शेर चतुर्दिक से किरणों-सी नाच रहीं सखियाँ दीवानी

नव वसंत-कूजित उपवन में पीले सरसा-कुसुम रहे खिल
तम-वेणी सी मधुकर-श्रेणी, पीतस रेणु उड़ रही झिलमिल
छिपा स्वर्ण-शाखाओं में मृग एक, कर्ण ही गोचर जिसके
चंचल चरण, कहीं से भी बस आहट मिली नहीं, झट खिसके
ढँकी किसलयों की ज़ाली में, आँखें कौतुकमयी दीखतीं
जिनसे जग की सब सुंदरियाँ भ्रू-विलास की कला सीखतीं
कस्तूरी-मद की लपटें उठ रहीं हृदय से उसके क्षण-क्षण
थकित,चकित-सा देख रहा वह इधर-उधर विस्मित, हत-चेतन

उस सौरभ से झूम रहे हैं पाटल, जुही-कुसुम अभिमानी

शशि का यह कलंक आकृतियाँ बदल रहा क्षण-क्षण मनमानी
इन तीनों चित्रों में अच्छा तुम्हें कौन-सा लगता, रानी!

1941