aayu banee prastavana

बरसात की बहारें, बरसात की फुहारें

आकाश हँस रहा है, धरती उमग रही है
हर दूब पर जवानी, हर डाल जग रही है
लतिका नई बहू-सी तरु-अंक लग रही है
पानी बरस रहा है, ज्वाला सुलग रही है
गिरिश्रृंग झूमते हैं, लहरें समुद्र खारे

पहली झमक, विपिन की नस-नस हरी हुई है
बौछार दूसरी में, सरिता भरी हुई है
पत्ती न नीम-तरु की नीलमपरी हुई है
वन-वन मयूर-पिक की अंताक्षरी हुई है
हर साँस से हवा की गिरते करोड़ तारे

गिरि-तलहटी हजारों चित्रोंभरी पटी-सी
नभ पर लचक रही है बिजली नयी नटी-सी
नद का तूफान तकती, तट-बालुका कटी-सी
यौवन खिला प्रकृति का साड़ी सटी-सटी-सी
झंझा-झकोर से ज्यों सरिता हिलोर मारे

वन्या नए सुरों से नव साज सज रही है
चोली सिहर रही है, बोली लरज रही है
बादल गरज रहा है, बिजली तरज रही है
झंकार झिल्लियों की ज्यों वीण बज रही है
हर और गूंजती हैं ‘पी’ की मधुर पुकारें

वन-वीथी-वेलियों की गोपन सहेलियों से
गागर नवेलियों-सी छलका हथेलियों से
धारा विलम न पायी गिरि-कुंज-केलियों से
खिलखिल चली उलझती पथ की सहेलियों से
जलनिधि जिसे दुलारा, क्या सर, सरित कगारे!

अंजित नयन धरा का, रंजित नयन गगन का
पीला शयन धरा का, नीला शयन गगन का
घन पर अयन धरा का, वन पर अयन गगन का
नव मधु -चयन धरा का नव वधु-चयन गगन का
मिल एक हो रहे हैं, भू व्योम के किनारे

रुक-रुक झमक-झमककर बौछार हो रही है
बिजली चमक-चमककर उस पार हो रही है
जो हार थी गले का, वह भार हो रही है
यह तीर-सी झड़ी ही तलवार हो रही है
मैं देखता गगन को बाँहें विकल पसारे

1957