alok vritt

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भग्न तारों को सजाकर,
साधना के स्वर मिलाकर,
आज मैं फिर से तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ;
शब्द की ईंटें हृदय की भावना का लेप लेकर
मैं समय के स्रोत पर मंदिर उठाना चाहता हूँ
और भावी पीढ़ियाँ जिसमें पढ़ें इतिहास अपना,
आँधियों के शीश पर नवकल्प के ज्योतिश्चरण का
मैं वही दीपक जलाना चाहता हूँ.
टूटता है व्योम तो नक्षत्र तो टिकता नहीं है
काल का जो घूमता है चक्र रुकता है भला कब!
किन्तु पुरुषार्थी पुरुष ऐसे कभी आते यहाँ हैं
रोक लेते क्रुद्ध अशनि-निपात अपने करतलों पर
काल-कालिय के कुटिल विषमय फणों को नाथ देते
जो सुधा लाते सुधाकर को समूल निचोड़कर भी,
फोड़कर घट उर्वशी का
धँस अतल में
क्रुद्ध वासुकि के दशन को तोड़कर भी.
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होती गयी रजनी गहन से गहनतर,
निज रूप की पहचान भी जाती रही,
चिरकाल से पिंजर-विवश मृगराज को
गिरि-श्रृंग का उन्मुक्त गर्जन भी गया हो भूल ज्यों.
संतान ऋषियों की जिन्हें कहते रहे
सुरलोक के जेता अमर मनु-पुत्र वे
श्रीहीन अश्वों-से विवश
दासत्व के रथ में जुटे
मणि-पाश करते थे प्रदर्शित चाव से.
ऐसे तमोमय क्षितिज पर
उतरी किरण-सी भानु की,
इस देश की संचित तपस्या ही हुई साकार ज्यों,
सशरीर जैसे सत्य हो;
फिर पोरबंदर में हुआ अवतरण अभिनव ज्योति का
जिसको सहज ही देवताओं की मिली
श्री, सिद्धि, शक्ति, विभूति, धी,
आयुध नये ही प्रेम के.
यों पुण्यफल-सी वृद्ध भारत-भूमि के
छवि दिव्य मोहन की हुई थी प्रस्फुटित.

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