alok vritt

हिन्दू-मुस्लिम-मेल, देश की मद्य-मुक्ति, सेवा हरिजन की
खादी का प्रचार घर-घर में, अब थी यही लगन जीवन की
आत्मशुद्धि का यज्ञ कठिन यह पूरा होने को जब आया
बापू ने इक्कीस दिनों के अनशन का संकल्प सुनाया–

‘धर्म बने हिंसा का साधन, देश रुधिर में खाये गोता
देखूँ मैं असहाय बना, यह सहन नहीं अब मुझसे होता
रुके न बाढ़ घृणा की तो मेरे जीवन का अर्थ नहीं है
कोई भी बलिदान मनुजता की सेवा में व्यर्थ नहीं है

सत्य-अहिंसा की धरती पर क्यों यह रक्तपात मचता है
मैं सौ बार मरूँ यदि मेरे मरने से भारत बचता है’

गद्गद हो कर विश्व सुन रहा था यह अमर प्रेम की वाणी
हिन्दू-मुसलमान दोनों की आँखों से बहता था पानी
‘बचें प्राण बापू के, भगवन!’ कहीं नमाज़, कहीं थी पूजा
पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्खिन भ्रातृ-भावना का स्वर गूँजा

जब सत्ता की नींद न टूटी जनमत जगा-जगाकर हारा
‘लक्ष्य पूर्ण स्वातंत्र्य हमारा,’ वीर जवाहर ने ललकारा
पहली बार देश ने अपना राजमुकुट वापस माँगा था
रावी के तट पर स्वदेश का स्वाभिमान फिर जागा था

उधर साधना, अनुभव वय का, इधर अधीर मचलता यौवन
दोनों में थी होड़ कि खोले कौन प्रथम जननी का बंधन
जलती नूतन दीपशिखा ज्यों बुझते हुए दिये की लौ से
सौंप रहा था ध्वजा राष्ट्र की, पिता पुत्र को क्लांत करों से

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