alok vritt

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आ चुके थे पर चतुर नायक पुलिस के
वीर पत्नी के अधूरे कार्य को पूर्णत्व देने
और अनजाने अमर सौभाग्य भारत का बचाने
शीघ्र सैनिक का बना कर वेश अपने प्रिय अतिथि का
साथ में दो छद्मवेशी दूत देकर
कर दिया सकुशल उन्होंने मुक्त राहु-समूह में से
इंदु मानव-चेतना का;
ज्यों कभी वसुदेव ने था कंस-कारागार से
घन-सघन भादों की निशा में
उमड़ती दुर्दांत यमुना-पार भेजा
शिशु कन्हैया को बचाकर,
या फलों की पेटिका में
सेवकों ने था निकाला
राष्ट्र के गौरव शिवा को
आगरे के कपट-कारागार से ज्यों.
और बाहर गा रही थी भीड़ तब भी–
‘चलो गाँधी को पकड़कर
सामने के पेड़ पर फाँसी चढ़ा दें’
तब चतुर रक्षाधिकारी ने कहा बाहर निकलकर
‘बंधुओ! गाँधी कहाँ है इस भवन में!
वह लगा कर पंख नभ में उड़ गया है
घुल गया है वायु में
वह भूमि की गहराइयों में खो गया है
व्यर्थ है फेनिल तुमुल गर्जन तुम्हारा,
यदि न हो विश्वास तो आकर स्वयं कर लो निरीक्षण,’
जो अधिक थे धृष्ट,
हर तिनका भवन का छानकर जब
फिर रहे थे हाथ मलते,
सिर झुकाये,
सूर्य तब निज चक्र का
मध्यांश पूरा कर चुका था

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