alok vritt

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अति घर्षण से हिम से भी उठती चिनगारी
जागा बिहार में एक कृषक दृढ़ व्रत-धारी
वह राजकुमार सुकुल जो लाया गाँधी को
गाँधी क्या, वह लाया बटोरकर आँधी को
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लिखने बैठा जब अधिकारी उनका बयान
बोले गाँधी,–‘मैं भारत का बुनकर किसान
हूँ कर्मचंद-सुत, मोहनदास, जाति गाँधी
पर नहीं जाति-कुल ने मेरी सीमा बाँधी’

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आयी रजनी फैलाये तम-कुंतल प्रगाढ़
चुप देख रहे थे तारे आँखे फाड़-फाड़
गृह-विपिन एक-से सभी, न दीखता मार्ग, कहाँ
प्रेतों-से तरु थे धनखेतों में जहाँ-तहाँ

कोई निर्भय एकाकी फिर भी बढ़ता था
पौरुष ज्यों अपने लिए नया पथ गढ़ता था
उस और कक्ष में विष से पूरित थाल सजा
गोरे दम्पति बैठे थे पथ पर कान लगा

थपकी कपाट पर सुनी कि अंतस् की पुकार
टकरायी प्राणों से आ-आकर बार-बार
पति तो बैठा ही रहा अकल्पित भय से डर
पत्नी ने साहस किया, द्वार खोले आकर

देखा जो, अद्भुत दृश्य सामने पड़ी चीख
थे खड़े स्वयं ईसा देने के लिए सीख

वह भाव नयन का स्नेहपूर्ण, वह सहज हास,
वह ज्योति अलौकिक दिव्य चेतना का प्रकाश
वह करुणा, वह निर्वैर कांति, वह शांत दृष्टि
थी भिगो रही आपाद शीश वह क्षमावृष्टि

चीत्कार हुआ ज्यो सहसा डूब रहे जन का
दौड़ा पति सुन कर शब्द प्रिया के क्रंदन का
देखा कि साश्रु वह अतिथि-पदों में पड़ी हुई
सिसकियाँ विकल भरती थी भू में गड़ी हुई

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