geet vrindavan

राधा मुरली कर में लेती
जहाँ झुके थे अधर श्याम के, वहीँ अधर धर देती

दौड़-दौड़ जाती पनघट पर
भर-भर कर लुढ़काती  गागर
चूम-चूम लेती झुक-झुक कर

यमुना-तट की रेती

मुख पर चन्दन-लेपन करती
माँग कुंद कलियों से भरती
फिर कदम्ब के तले सँवरती

मिली जहाँ प्रिय से थी

जपती माला सतत नाम की
साध लिये अंतिम प्रणाम की
वह भी क्या कर सकी, श्याम की

जो थी कभी चहेती !

राधा मुरली कर में लेती
जहाँ झुके थे अधर श्याम के, वहीँ अधर धर देती