geet vrindavan

पत्री कैसे लिखूँ, कन्हाई!
संबोधन लिखने में ही तो कँपने लगी कलाई

नाथ! अनाथ मुझे क्यों छोड़ा!
स्वामी! कैसे यों मुख मोड़ा!
बन प्राणेश प्रीति-प्रण तोड़ा

तिल भर दया न आयी

कैसे लिख दूँ ‘यहाँ कुशल है’
विरह-नदी जब बढ़ी प्रबल है
डूब रहा कुल व्रजमंडल है

तट पड़ता न दिखाई

आँसू से भीगा कागज़ यह
कलम हाथ से गिरती रह-रह
कैसे लिखूँ व्यथा जो दुस्सह

रहती मन में छाई!

 

पत्री कैसे लिखूँ, कन्हाई!
संबोधन लिखने में ही तो कँपने लगी कलाई