hum to gaa kar mukt huye

कोयल की कुहक का यहीं अंत है

माना, पुन: लौटता वसंत है

 

तरु से जो पत्र आज झड़ गया

आयेगा रूप लिए फिर नया

जीवन अमर है यही जानकार

आती न हो वायु को तनिक दया

रोता ही रहा परन्तु वृंत है

 

सिन्धु-तीर लहरों का ताँता है

मन का जुड़ गया कहीं नाता है

सलिल वही लौटता हो बार-बार

ज्वार वही लौट नहीं पाता है

क्या हो जो सृष्टि-क्रम अनंत है

 

कोयल की कुहक का यहीं अंत है

माना, पुन: लौटता वसंत है

 

Oct 86