hum to gaa kar mukt huye

कोयल पंचम सुर में बोली

मधुर सुरों ने ज्यों अंतर की दुखती गाँठ टटोली

 

शांत प्रकृति के उर में फिर से लहर प्यार की डोली

रंग-बिरंगे फूल आ गये बना-बनाकर टोली

जो रहस्य की बात आज तक नहीं गयी  थी खोली

फैल गयी है वह घर-घर में बनकर एक ठिठोली

 

तेरा वह छिपकर आना, मुख पर मल देना रोली

जाने कैसे पल भर में ही थी अनहोनी हो ली

नाच रही है स्मृति में कोई चितवन भोली-भोली

फिर गुलाब की पंखड़ियों से भर ली मैंने झोली

कोयल पंचम सुर में बोली

 

Jan 87