hum to gaa kar mukt huye

जब भी कलम हाथ से छोड़ी

तुरत खिलखिलाकर  पहले-सी तुमने ग्रीवा मोड़ी

 

दूर  हुए भी जग के लेखे

सम्मुख सदा नयन वे देखे

ओ मेरे साथी सपने के!

मैंने तो अपने अंतर की गाँठ तुम्हीं से जोड़ी

 

माना, अब घट रीत रहा है

क्षण-क्षण जीवन बीत रहा है

किन्तु प्रेम तो जीत रहा है

यह प्राणों की डोर काल से भी न जायगी तोड़ी

 

फिर से नव गृह में नव वय में

मिलते ही पहले परिचय में

जाग उठेगी प्रीति हृदय में

लिए किशोर-चपलताओं में लज्जा थोड़ी-थोड़ी

 

जब भी कलम हाथ से छोड़ी

तुरत खिलखिलाकर  पहले-सी तुमने ग्रीवा मोड़ी

 

Dec 86