hum to gaa kar mukt huye

मैं आँधी का तिनका

जान नहीं पाया अब तक, यह महावेग है किनका

 

क्षिति-जल-पावक-गगन-समीरण

जब ये सारे हैं निश्चेतन

कौन किया करता है क्षण-क्षण

फिर संचालन इनका?

 

मैं अनंत में भटक रहा हूँ

पत्थर पर सिर पटक रहा हूँ

महाशून्य में लटक रहा हूँ

ज्यों पत्ता पुरइन  का

 

मैं अणु नहीं, न मैं तारा हूँ

बँधा न जड़ तत्त्वों द्वारा हूँ

देश-काल से भी न्यारा हूँ

अनुचर हूँ मैं जिनका

 

मैं आँधी का तिनका

जान नहीं पाया अब तक, यह महावेग है किनका

 

June 86