kavita

गीतों की बिदाई

अपने गान लो, मैं चला
भर पिकी के कंठ में, कुछ रख सुमन में
कुछ सजाकर तारकों की तिमिर-स्नाता
श्याम चितवन में
सॉँझ की मैं वायु-सा प्रिय! जा रहा हूँ,
छोड़ उन्मन विरह के निःश्वास अपने
आज निर्जन में –
जो दिए तुमने सुरभि के वे मधुर वरदान लो, मैं चला
लौटते निर्झर नहीं पथ-श्रांति से डर
लौटकर आती नहीं शबनम कुसुम के
स्नेह-अंचल में
आ सकूँगा लौटकर फिर किस तरह मैं
दूर सुन वंशी तुम्हारी, प्रिय! प्रणय-
अभिसार के पल में
जो मिला अनजान में वह स्नेह लो, वह मान लो, मैं चला
पर्वतों की चोटियों पर, घाटियों में
रात-दिन चलता रहूँगा मैं तुम्हारी
प्रणय-स्मृति लेकर
फूल की मुस्कान मोहेगी नहीं मन
अब न होंगे प्राण न्यौछावर कली की
एक चितवन पर
एक मधुमय भूल यौवन की मुझे भी जान लो, मैं चला
अपने गान लो, मैं चला

1941