kavita

आज कुसुम कुम्हलाये

कल ही तो मैंने इनसे थे अपने केश सजाये

 

मेरे फूल न तुम कुम्हलाना

प्रिय! पतझर में भी मुस्काना

खिलना, बस खिलते ही जाना, जग से आँख चुराये

 

देख न सके तुम्हें मधुबाला

पी न सको अधरों की हाला

सौरभ बन पथ में उड़ जाना, कोई जान न पाये

 

पी चम्पक-कपोल-मधु जी भर

झूम अलक में, पलक चूमकर

बन जाना अधरों में मर्मर, जब प्रेयसी लजाये

 

छू रज-कण प्रिय-पथ का प्यारा

चरणों का बन जाय सहारा

युग-युग तक संगीत तुम्हारा, मिलन रागिनी गाये

 

आज कुसुम कुम्हलाये

कल ही तो मैंने इनसे थे अपने केश सजाये