kitne jivan kitni baar

मैंने मरु में केसर बोयी

नहीं एक भी अंकुर फूटा, सिकता लाख भिगोयी

 

निशिदिन नयन-नीर से सींचा

अंतर का कुल स्नेह उलीचा

गया मूल तो उसका नीचा

पर जग के हित खोयी

 

जो निर्गंध कनक के लोभी

उनको क्या, भू सुरभित हो भी

पर न दिखी जब रसिकों को भी

जागी पीड़ा सोयी

 

कितना भी पर आज उपेक्षित

है मुझमें विश्वास अपरिमित

इस सुगंध पर होगा मोहित

कभी कहीं तो कोई