nao sindhu mein chhodi

वही है धरा वही है अम्बर 

वही चाँद सूरज तारे हैं केवल मैं न कहीं पर

 

मन चेतन शक्ति अमर है

जड़ भी जिसका रूपांतर है

पर मेरी अस्मिता किधर है

जो थी इसमें भास्वर

 

रहे न कोई अब चिंता-भय

सारे मोह-शोक भी हों लय

किन्तु मुझे तो नाम-रूपमय

जीवन ही था प्रियतर

 

यदि मेरी सत्ता न बची है

तूने क्यों यह सृष्टि रची है ?

मुझसे भी पूछा कि जँची है

मुक्ति भुक्ति से बढ़ कर

 

वही है धरा वही है अम्बर 

वही चाँद सूरज तारे हैं केवल मैं न कहीं पर