sita vanvaas

कैकेई मन में थी पछताती

‘मैं विषबेलि न बोती यदि क्यों सीता यह दुःख पाती

 

‘यदि न मंथरा मुझे चढ़ाती

मैं हठ कर न वचन मनवाती

क्यों कुलवधू असुरपुर जाती!

दुष्टों की बन आती!

 

‘पावक भी न जिसे छू पाये

सती शिरोमणि जो कहलाये

पति से उसका त्याग कराये

विधि गति कही न जाती

 

‘क्यों न साथ मैं भी वन जाऊँ

कुछ तो पाप ताप धो पाऊँ

राजा को कैसे समझाऊँ

किये वज्र सी छाती!’

 

कैकेई मन में थी पछताती

मैं विषबेलि न बोती यदि क्यों सीता यह दुख पाती