sita vanvaas

सुन पति-वचन स्नेह में साने

काँपी देह, नयन भर आये, कहा न कुछ सीता ने

 

पुत्रवधू को देख निरुत्तर

माँ का हृदय हो उठा कातर

बोली सुत की ओर पलटकर–

‘तू यह दुख क्या जाने!

 

‘तूने सेतु सिन्धु पर बाँधा

पर नारी का हृदय न साधा

अब तक मिली न कोई बाधा

पूरे जो प्रण ठाने

 

‘पर ऐसी मर्यादा पाले!

पत्नी की लज्जा न सँभाले!

कभी निकाले, कभी बुला ले

क्यों वह रोष न माने!’

सुन पति-वचन स्नेह में साने

काँपी देह, नयन भर आये, कहा न कुछ सीता ने