usha

तुम कौन पिकी-सी रही बोल
यौवन माधवी-मुकुल में, निज प्राणों की पीड़ा-व्यथा घोल?

कलियों  में  राग-मरंद  भरा
हँसता कण-कण छल-छंद भरा
मेरा  मानस  दुख-द्वंद्व -भरा

जगता पाटल-सा सिहर, डोल

भू-मानस-हार, गगन-शतदल
मैं चूम चरण वे किरणोज्ज्वल
भर लूँ मृदु छवि से अंतस्थल

मधुपों-सी बंदी अलक खोल

विस्मय  के  तट  रो  रहा  मान
स्वर  बनते  जाते  आत्म-दान
भय से नव-वय कलिका-समान

स्मिति भौंहों पर जा चढ़ी लोल

तुम कौन पिकी-सी रही बोल
यौवन माधवी-मुकुल में, निज प्राणों की पीड़ा-व्यथा घोल?