shabdon se pare

जीवन में संघर्ष न हो तो जीवन में क्‍या स्वाद रहेगा!
पीड़ा की ऊष्मा न मिलेगी
पतझर और वसंत न होगा
सुख, दुख, मिलन, विरह, स्मिति, आँसू
आदि न होगा, अंत न होगा
समरसता निर्बाध अकुंठित, पर क्‍या उसके बाद रहेगा!
माना जीवन दुख ही दुख है
पर क्‍यों पग पड़ता सम्मुख है
सदा अनागत के स्वागत की
उत्सुक आकुलता में सुख है
बिछुड़न की पीड़ा का दंशन सदा प्रेम की याद रहेगा!
मैं पथ में ही छूटूँ तो क्‍या!
लहर लहर-सा टूटूँ तो क्‍या!
निज “मैं’ की कल्पित कारा में
रोऊँ, गाऊँ, रूठूँ तो क्या!
सूखे सिंधु, लहर मिट जाये, जल तो बिना विवाद रहेगा
जीवन में संघर्ष न हो तो जीवन में क्‍या स्वाद रहेगा!

1966