बलि-निर्वास_Bali Nirvas

  1. पंचम अंक-कल्प वृक्ष की सबसे ऊँची शाखा पर से  
  2. पंचम अंक-दम्भपूर्ण अधिकार, स्वार्थ या चिर-अबाध वासना-विलास  
  3. पंचम अंक-राई में सुमेरु ज्यों विशाल वट बीज में हो  
  4. पंचम अंक-वांछित जो माँगें आप, सौंवे बलिकाल में  
  5. प्रथम अंक -यदि स्वर्ग कहीं है त्रिभुवन में 
  6. द्वितीय अंक -जीवन-संध्या में आज, पथिक तुम थके और हारे-से हो  
  7. तृतीय अंक-जीवन वसंत सा हुआ 
  8. चतुर्थ अंक-मधुप ! तुम भूल गए रस-केलि 
  9. चतुर्थ अंक-मधुप तुम कबसे हुए विरागी 
  10. चतुर्थ अंक-मधुकर यह मधुवन क्यों भूले  
  11. चतुर्थ अंक-मधुप तुम भूले प्रीति पुरातन  
  12. चतुर्थ अंक-मना लूँ मन को तो, सजनी !  
  13. चतुर्थ अंक-मधुकर तुम हो बड़े प्रवीण 
  14. चतुर्थ अंक-सखी री! समय-समय की बात  
  15. चतुर्थ अंक-अवधि में क्या हो, किसे पता ! 
  16. चतुर्थ अंक-सखी री ! इतने बैरी तेरे 
  17. चतुर्थ अंक-अमरे ! तुझसे अच्छी काशी 
  18. चतुर्थ अंक-सखी री, ! बीत गये दिन कितने 
  19. चतुर्थ अंक-विरह की यह तो पीर नहीं 
  20. चतुर्थ अंक-मैंने जो व्रत-नेम किये 
  21. चतुर्थ अंक-फड़कती क्यों यह दायीं आँख 
  22. चतुर्थ अंक-नयन के शर-संधान किये 

• “आप जन्मजात कवि हैं। ’बलि-निर्वास’ की प्रथम पंक्तित ही ’यदि स्वर्ग कहीं है तो वह मेरे ही उर में है’ आपकी अद्भुित प्रतिभा का परिचय देती है। तथा ’पद-विन्यासमात्रेण’ की उक्तिह को चरितार्थ करती है।”
-मैथिलीशरण गुप्त

• “आपका ’बलि-निर्वास’ खूब है। मैंने और पंतजी ने उसे अत्यन्त चाव से पढ़ा है। हम दोनों आपके परम प्रशंसक हैं।”
-हरिवंश राय बच्चन