alok vritt

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हृदय में भीति सत्ता के जगी थी
कि कैसे आग पानी में लगी थी
न लाठी थी, न गोली थी, न बम थे
नमक के घाव तोपों से न कम थे

झुकाकर दर्प ने निज क्रुद्ध फण को
बुलाया मेज पर उस निर्वसन को
मधुर मुस्कान के पीछे छुरी थी
सुखद फिर भी लन्दनपुरी थी

बड़ी ही शिष्टता थी आचरण में
छिपे थे सिंह-नख शब्दावरण में
छलावा किन्तु यह पहचानते थे
उसे बापू निकट से जानते थे

उन्हें जब मोहिनी बस कर न पायी
नये अंदाज़ से वह मुस्कुरायी
दिये यों तो सभी सुख-साज़ उसने
छिपाकर रख लिया पर ताज उसने

हुआ मतदान का फल भी अनोखा
यहाँ पर देश ने खाया न धोखा
हज़ारों देवता आगे बढ़े थे
मगर सब फूल गाँधी पर चढ़े थे

प्रदेशों को मिली स्वाधीनता थी
भले ही मूल में श्रीहीनता थी
प्रवंचित राष्ट्र थककर सो रहा था
उधर इतिहास तत्पर हो रहा था

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