alok vritt

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मुँह से उफ् तक किये बिना अधिकारों के हित अड़ना है
नहीं आदमी से, उसकी दुर्बलताओं से लड़ना है
जुड़ता जब सम्बन्ध हृदय का, भेद-भाव मिट जाता है
देश-जाति-रंगों से गहरा मानवता का नाता है

ऊर्ध्वगामिनी चेतनता पाषाण फोड़कर आयेगी
यह मानव-विकास की धारा आगे बढ़ती जायेगी
लाँघ न पाया जिसको कोई एक प्रेम की रेखा है
पंख कुतरकर रख दे मन के, ऐसा आयुध देखा है!

चले प्रेम करने जो रिपु से, जग की व्यथा बटोर चले
अभय कवचधर उन वीरों पर शस्त्रों का क्या जोर चले!
हँस-हँसकर अंगारे चुगते शशि की और चकोर चले
जैसे घन-पाहन-वर्षण में पर फैलाए मोर चले
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उर में प्रेम नयन में दृढ़ता, मुख पर ले मुस्कान चले
तोपों को देखा तो सम्मुख अपना सीना तान चले
तलवारों की खड़ी धार पर प्रेम-पथिक अम्लान चले
शासन कैसे चले जहाँ पर बल का नहीं प्रमाण चले

स्मट्स हाथ मल-मलकर ‘कहता कैसे लड़ूँ लड़ाई यह!
राजनीति, रणनीति कहीं भी मुझे न गयी सिखाई यह
नहीं समझ में आता है रिपु है या मेरा भाई यह
कारा उसको मुक्ति, मुक्ति मुझको कारा दुखदायी यह’
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सत्याग्रह के शब्दकोष में शब्द नहीं दुर्बलता का
पथ का हर व्यवधान बना करता सोपान सफलता का
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इसी सत्य को धारण कर प्रहलाद आग में मुस्काया
कवच पहन कर यही कन्हैया कंस-कोप से लड़ पाया
इसके बल से ही बलि ने सुरपति का मुकुट उतार लिया
राज्य-रहित भी राघवेन्द्र ने रावण का संहार किया
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सत्य एक अव्यक्त, अलौकिक, अकथनीय अनुभव है
शिव जिसको हम कहते हैं वह बिना सत्य के शव है
सत्य नहीं देखा, उसने निज को भी क्या पहचाना!
तर्क कहाँ! विश्वास कहाँ! वह ज्ञान कहाँ जो जाना!

अणुओं के गुंफन से जो यह ऊर्जा निकल पड़ी है
वह भी तो बस उसी सत्य का ले आधार खड़ी है
अंतिम कारण, मूल प्रकृति वह, ब्रह्म कहो या चिति है
देश वही है, काल वही है, आदि वही है, इति है’

चिंतन के चरखे से थे भावी के सूत्र निकलते
लीक खींचते काल-पृष्ठ पर चरण रहे थे चलते

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