kavita

भावना

दूर से मुझकों बुलाती एक ध्वनि-सी आ रही है
ऊर्मियों के जाल में कोई सलोनी गा रही है
पास जाना चाहता मैं रूप की उस रागिनी के
स्वप्न की प्रतिमा मगर वह दूर होती जा रही है

सेज पर सोयी क्षितिज की, बादलों की ओढ़ चादर
मुस्कुरा देती कभी निज श्याम अवगुंठन हटाकर
स्वर्ण-संसृति-सी नयन के सामने सहसा उतरती,
देखता अपलक झलक मैं हर्ष-विस्मय से जड़ित-स्वर

आ रही मधु-यामिनी नव तारकों का हार लेकर
प्राण निश्चल रह सकेंगे यह उमड़ता प्यार लेकर!
कर सका है कौन उस सौंदर्य की जग में उपेक्षा!
कर सकूँगा किस तरह मैं कवि-हृदय सुकुमार लेकर!

दे रहे उपदेश संगी, क्‍यों न स्वीकृत हार कर लूँ
किंतु यौवन कह रहा यह सिंधु विस्तृत पार कर लूँ
झेलकर तूफान, लहरों में जगाऊँ प्यार अपना
व्योम की जलती विभा लेकर प्रणय-अभिसार कर लूँ

हाय, जिस दिन कंटकों से फूल बिँधवाये गये थे
व्योम के वासी धरा पर खींचकर लाये गये थे
प्रेम कों सींचा गया था वासना की क्यारियों में
सीपियों में शुभ्र मोती कैद करवाये गये थे

था मिला उस रोज कवि को, यह निराशापूर्ण जीवन
आह बन टकरा रहा था शून्य में अभिशप्त यौवन
री लहरियो! आज अपने गीत अपने में छिपा लो
अब न जीवन में करेंगे प्यार की मनुहार लोचन

 1940