kavita

माँझी से

 

(रवीन्द्रनाथ के प्रति)

 

किसे पुकार रहा तू माँझी! धूमिल संध्या-वेला में

सागर का है तीर, खडा हूँ संगीहीन अकेला, मैं

डूब चुका रवि अरुण, थकी लहरें, उदास है सांध्य-पवन

तारक-मणियों से ज्योतित नीलम-परियों के राजभवन

मधुवन पीछे लहराता है शांत मरुस्थल के उर में

आगे तरल जलधि-प्रांगण रोता विषाद-पूरित सुर में

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शिथिल बाँह, पग काँप रहे, कंठ-स्वर रुँधने को आया

झुकी कमर, जड़-काष्ट उँगलियाँ, जीर्ण त्वचा, जर्जर काया

समझा, जीवन की संध्या में आज पुकार रहा किसको

कौन तरुण वह, सौंप चला जायेगा यह नौका जिसको

आ जा माँझी! छाया-सा चुपचाप उतर निर्जन तट पर

इन लहरों से मैं खेलूँगा अब तेरी नौका लेकर

1941