kavita

मेरे नयन नीरभरे

हलकी पवन बही पुरवैया
काँप उठी नयनों की नैया
नव अषाढ-घन-से आँगन में सारी रात झरे

नहीं एक पल सकी पलक लग
रात बिता दी तारों-सी जग
निर्जन कक्ष, विरह-कातर मन, रोम-रोम सिहरे

बीता दिन भी, आयी रजनी
आये नहीं हृदय-धन, सजनी!
अब तू ही बतला दे, धीरज कैसे हृदय धरे!
सखि ! ये नयन नीरभरे

1941