kavita

मैं कवि के भावों की रानी
मेरे पायल की छूम  छननन  गुंजित कर देती जग उपवन
जड़ भी हो उठते हैं चेतन पाषाणों को मिलती वाणी

भर  जाती  सुषमा से मधुकर अलसित पलकों में स्वपन  सघन
मैं कवि की कुटिया  में क्षण क्षण आती अम्बर से दीवानी

मेरे अस्फुट कंठों  का स्वर नादित होता जग वीणा पर
दोहरा जाता है ये सागर मेरे अंतर की ही वाणी

कुहुकी कोयल काली काली मैं मधुमट  भर लायी आली
उठ कर ले सपनों की प्याली आज ढलेगी मनमानी