kavita

आज तन-मन खो रहे हैं
आप अपने में ग्रथित-सा
आज है जीवन थकित-सा
आज लगते प्राण मानो युग-युगों से सो रहे हैं
स्वन-सा फैला गगनतल
नींद-सी संध्या रही ढल
पुतलियों-से मेघ जिनमें मौन चित्रित हो रहे हैं
काँपते हैं अधर सुनकर
आप अपने ही कहे स्वर
अश्रु इठला पूछ जाते हैं “नयन क्‍यों रो रहे हैं?!
आज तन-मन खो रहें हैं

1940