kavita

लघु-लघु प्रदीप, लघु-लघु प्रकाश
जो सिमट-सिमट रह जाता है लिपटा अपने ही आसपास
घन अंधकार
जिसमें डूबा अग-जग अपार
क्षत, शक्ति-हीन
नत, भक्ति-लीन
मेरा दीपक बाँहें पसार
कर रहा मूँद अपलक पलकें
अपने पतंग से ललक प्यार
ग्राणों से प्राणों का हुलास
त्तरुणी सुंदर
सोने का अंचल रहा सिहर
बुन रजत-जाल
चुन नखत-माल
कुछ लाज भरी-सी मुसकाकर
अंगों में यौवन-दीप्ति लिये
किस प्रियतम के जा रही पास!
घुल रहे छंद
बहती सरि-सी कविता अमंद
संसार लुब्ध
सौ बार मुग्ध
खुलते रजनी के द्वार बंद
अब रत्नकणी-सा हेर रहा
अपनी सुषमा का सहज हास
सीमित जीवन
रे सीमित जीवन के क्षण-क्षण
भय – प्रणत – दीप
है त्तम समीप
सागर-सा भरता आवर्तन
जाने कब आकर एक लहर
हर ले जाये पल में हुलास
यह विफल रंग
आया न पास कोई पतंग
ले प्रणय प्रचुर
दे हृदय मधुर
जो जलता निशि में संग-संग
चिर-व्यर्थ, हाय! सौंदर्य, स्नेह
चिर-व्यर्थ अधखुला बाहुपाश
वह क्षणिक परस
हो गया हृदय चिर सरस-सरस
वह अरुण प्रहर
वह तरुण. लहर
अंचल में जो रस गया बरस
बुझते दीपक में भर जाता
जीवन, जीवन की तीव्र प्यास
अब क्षीण राग
हौले सुर में बजता विहाग
अब तार मींच
झंकार खींच
जाता नभ में अस्तित्व त्याग
कर याद मिलन के मधुर चित्र
अब भरता है ठंडी उसाँस
बस एक रात
लघु क्‍या, महान क्या, एक बात!
जब मृत्यु अटल
सबका ध्रुव फल
फिर क्‍यों गुरुता-हित रक्तपात!
यह सोच, शक्ति भर सीमा में
करता है जलने का प्रयास
लघु-लघु प्रदीप, लघु-लघु प्रकाश

1940