kitne jivan kitni baar

संध्या की वेला

श्रांत-वदन क्लांत-चरण और मैं अकेला

शून्य गगन शून्य धरा
लुप्त किरण ज्योति-करा
उर में अनुताप भरा स्मृतियों का मेला

कहाँ सहृद बंधु सभी
संग थे जो अभी अभी !
कर का दर्पण तक भी करता अवहेला