nahin viram liya hai

 तुमने वंशी तो दी कर में 

पर उसका क्या करूँ नहीं यदि गूँज उठे अंतर में !

अधरों पर ही नाचा करता
राग ह्रदय में नहीं उतरता
दीप द्वार पर तो हूँ धरता
तिमिर भरा है घर में

करुणामय ! बस इतना वर दो

उर में श्रद्धा के स्वर भर दो
भाव अमरता के दृढ़ कर दो

रहें न प्राण अधर में

जिसने तुम्हें स्वयम् में जाना
खेल मरण को उसने माना
चिंता क्यों हो वस्त्र पुराना

यदि बदले पल भर में !

 

 तुमने वंशी तो दी कर में 

पर उसका क्या करूँ नहीं यदि गूँज उठे अंतर में !