sita vanvaas

चली जल को सीता सुकुमारी

रघुकुल-वधू, प्रिया-त्रिभुवननायक की, जनक-दुलारी

 

उभरे चित्र विकल कर मन को

फिर पति के सँग निकली वन को

चित्रकूट पर फिर दर्शन को

जुड़े अवध-नर-नारी

 

फिर कंचन-मृग मन को भाया

प्रभु को धनु-शर ले दौड़ाया

देवर से हठ स्मृति में आया

गली ग्लानि की मारी

 

दिखे भालु-कपि शीश झुकाये

लौटी अवध, हर्ष फिर छाये

टूटा ध्यान, नयन भर आये

फिरी लिए घट भारी

चली जल को सीता सुकुमारी

रघुकुल-वधू, प्रिया-त्रिभुवननायक की, जनक-दुलारी